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लखनऊ। राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित Kokoro Art Gallery में गुरुवार को चर्चित फोटोग्राफर शैलेन्द्र कुमार की एकल फोटोग्राफी प्रदर्शनी ‘सोल ऑफ काशी – ए मोनोक्रोम’ का भव्य उद्घाटन हुआ। पटना के रहने वाले कलाकार शैलेन्द्र कुमार की इस प्रदर्शनी ने शहर के कला प्रेमियों, सांस्कृतिक हस्तियों और रचनात्मक समुदाय के सदस्यों को एक ही मंच पर एकत्र कर दिया। उद्घाटन अवसर पर अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त समकालीन कलाकार Subodh Gupta मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे और पारंपरिक दीप प्रज्वलन कर प्रदर्शनी का शुभारंभ किया।
‘सोल ऑफ काशी – ए मोनोक्रोम’ शीर्षक से आयोजित यह प्रदर्शनी शैलेन्द्र कुमार के श्वेत-श्याम (मोनोक्रोम) छायाचित्रों का एक सशक्त और विचारोत्तेजक संकलन है। पटना से निकलकर राष्ट्रीय कला परिदृश्य में अपनी पहचान बना रहे शैलेन्द्र कुमार ने काशी की आध्यात्मिकता, स्थापत्य वैभव और सांस्कृतिक जीवंतता को कैमरे के माध्यम से अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रदर्शनी के साथ ही उनकी फोटोग्राफी पुस्तक ‘Soul of Kashi… a Monochrome’ का भी औपचारिक लोकार्पण किया गया। यह पुस्तक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था Rupa Publications द्वारा प्रकाशित की गई है और प्रदर्शनी के अनुभव को विस्तारित रूप में पाठकों तक पहुँचाती है।
इस प्रदर्शनी का क्यूरेशन जानी-मानी कला समीक्षक और विदुषी Dr Vandana Sehgal ने किया है। उन्होंने काशी के घाटों, पवित्र गंगा, प्राचीन इमारतों, मंदिरों की रूपरेखाओं और अनुष्ठानों की सूक्ष्म परतों को एक सुसंगठित दृश्य-विन्यास में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, काशी केवल एक भौगोलिक नगर नहीं, बल्कि आस्था, चेतना और समय की निरंतरता का प्रतीक है। प्रदर्शनी में प्रस्तुत प्रत्येक छायाचित्र इसी निरंतरता को प्रकाश और छाया के अनुशासित संयोजन के माध्यम से मूर्त रूप देता है।
श्वेत-श्याम माध्यम का चयन इस प्रदर्शनी की विशेषता है। रंगों के आकर्षण से मुक्त होकर ये चित्र बनावट, रेखाओं, ज्यामितीय संरचनाओं और प्रकाश के सूक्ष्म खेल को अधिक प्रभावशाली ढंग से उभारते हैं। काशी के घाटों की सीढ़ियाँ, गंगा की लहरों पर पड़ती सुबह की किरणें, धूप-छाँव में नहाए मंदिरों के शिखर और संकरी गलियों की गहराई—सब कुछ एक ध्यानपूर्ण दृश्य-भाषा में सामने आता है। इन छवियों में केवल दृश्य नहीं, बल्कि मौन, प्रतीक्षा और समय का स्पंदन भी महसूस होता है।
शैलेन्द्र कुमार का मानना है कि काशी को समझना केवल उसे देखना नहीं, बल्कि उसे महसूस करना है। उनके अनुसार, “काशी में हर पत्थर, हर घाट और हर प्रार्थना में एक अनकहा इतिहास छिपा है। मोनोक्रोम माध्यम उस इतिहास की गहराई को अधिक स्पष्टता से सामने लाता है।” पटना के इस कलाकार ने अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है। उनकी तस्वीरें दस्तावेज़ भर नहीं हैं, बल्कि एक आत्मीय संवाद का माध्यम हैं, जो दर्शकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।

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मुख्य अतिथि सुभोध गुप्ता ने उद्घाटन अवसर पर कहा कि श्वेत-श्याम फोटोग्राफी में विषय की आत्मा को पकड़ना चुनौतीपूर्ण होता है, परंतु शैलेन्द्र कुमार ने काशी की आध्यात्मिक ऊर्जा और स्थापत्य की भव्यता को अत्यंत संवेदनशील दृष्टि से अभिव्यक्त किया है। उन्होंने प्रदर्शनी को “दृश्य ध्यान” की संज्ञा देते हुए कलाकार के प्रयासों की सराहना की।
डॉ. वंदना सहगल ने अपने संबोधन में कहा कि काशी को रंगों से परे देखने पर उसकी भावनात्मक गहराई और भी स्पष्ट हो जाती है। उनके अनुसार, “मोनोक्रोम हमें बाहरी चकाचौंध से हटाकर मूल अनुभव की ओर ले जाता है, जहाँ आस्था, स्मृति और समय एक साथ उपस्थित होते हैं।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रदर्शनी दर्शकों को केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर सोचने और महसूस करने के लिए आमंत्रित करती है।
उद्घाटन समारोह में कला जगत की कई प्रमुख हस्तियाँ, शहर के वरिष्ठ कलाकार, लेखक और कोकोरो आर्ट गैलरी की टीम के सदस्य उपस्थित रहे। प्रदर्शनी स्थल पर दर्शकों ने छवियों के सामने रुककर गहनता से उन्हें देखा और कलाकार से संवाद भी किया। कई कला प्रेमियों ने इसे काशी की आत्मा से साक्षात्कार कराने वाला अनुभव बताया।
‘सोल ऑफ काशी – ए मोनोक्रोम’ प्रदर्शनी 20 मार्च 2026 तक Kokoro Art Gallery में आम दर्शकों के लिए खुली रहेगी। कला और फोटोग्राफी में रुचि रखने वाले लोग इस अवधि में प्रदर्शनी का अवलोकन कर सकते हैं। पटना के कलाकार शैलेन्द्र कुमार की यह पहल न केवल बिहार के कला परिदृश्य के लिए गौरव का विषय है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नए दृष्टिकोण से देखने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करती है।
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