उत्सव मौसम के तहत ‘मीनू’ का मंचन; उज्ज्वला गांगुली के दमदार अभिनय ने जीता दर्शकों का दिल

पटना। बिहार आर्ट थियेटर कालिदास रंगालय में चल रहे उत्सव मौसम के अंतर्गत आज हिंदी नाटक ‘मीनू’ का सफल मंचन किया गया। दर्शकों से खचाखच भरे सभागार में प्रस्तुत इस नाटक ने अपनी संवेदनशील कहानी, सशक्त संवादों और कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय के माध्यम से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। निर्देशक के सधे हुए मार्गदर्शन और कलाकारों की गहरी भावनात्मक अभिव्यक्ति ने नाटक को एक सशक्त प्रस्तुति का रूप दिया।

नाटक ‘मीनू’ एक चंचल, नटखट और शरारती लड़की की कहानी है, जो युवावस्था में प्रवेश करने के बावजूद अपने भीतर के बचपन को छोड़ नहीं पाती। उसकी यही मासूम शरारतें और बच्चों जैसी हरकतें गाँव में चर्चा और तिरस्कार का कारण बन जाती हैं। मीनू की उम्र विवाह योग्य हो चुकी है, परंतु उसकी अल्हड़ता और बालसुलभ स्वभाव के कारण लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते। गाँव के लोग उसे अक्सर उसकी हरकतों के लिए उलाहना देते रहते हैं, जिससे वह खुद भी अपने अस्तित्व को लेकर उलझन में पड़ जाती है।

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इसी बीच गाँव लौटता है—अपूर्व, जो शहर में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। बी.ए. पास करने के बाद जैसे ही वह अपनी माँ से मिलने गाँव आता है, उसकी माँ विवाह का प्रस्ताव रखती है। अपूर्व अपनी होने वाली जीवनसंगिनी को पहले देखना चाहता है, और इसी दौरान उसकी मुलाकात मीनू से होती है। मीनू की अल्हड़ता, उसकी निश्छल हँसी और सहज व्यवहार अपूर्व को instantly आकर्षित कर लेते हैं। वह उसी क्षण मीनू को विवाह का प्रस्ताव दे देता है।

अपूर्व की माँ को यह विवाह मंज़ूर नहीं होता, क्योंकि गाँव में मीनू की छवि एक शरारती और नासमझ लड़की की ही है। लेकिन बेटे की ज़िद और मीनू के प्रति उसके गहरे लगाव के आगे उन्हें झुकना पड़ता है। अंततः दोनों परिवारों की रज़ामंदी से विवाह संपन्न होता है।

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विवाह के बाद भी मीनू अपने बचपने से उबर नहीं पाती। वह दांपत्य जीवन की गंभीरता और ज़िम्मेदारियों को समझने में असमर्थ रहती है। दूसरी ओर, अपूर्व अपनी आगे की पढ़ाई के लिए शहर लौट जाता है, पर मीनू गाँव में ही रहने की ज़िद पर अड़ी रहती है। अपूर्व से दूरी उसके भीतर धीरे-धीरे परिवर्तन लाती है। उसके व्यवहार में परिपक्वता आती है, और उसका अल्हड़पन प्रेम में बदलने लगता है। वह अपने पति को समझने और उसके जीवन का हिस्सा बनने की ओर कदम बढ़ाती है।

मीनू के इस रूपांतरण को उज्ज्वला गांगुली ने बेहद प्रभावशाली अभिनय से मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी अभिव्यक्ति, संवाद अदायगी और भावनात्मक उतार-चढ़ाव ने दर्शकों को पूरे समय बांधे रखा। दर्शकों ने कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से उनके अभिनय का स्वागत किया।

कार्यक्रम के दौरान बिहार आर्ट थियेटर के अध्यक्ष श्री आर.एन. दाश, वरीय उपाध्यक्ष डॉ. निहोरा प्रसाद यादव, महासचिव कुमार अभिषेक रंजन तथा सुष्मिता मुखर्जी सहित कई रंगकर्मी और कला प्रेमी उपस्थित रहे।

उत्सव मौसम के इस मंचन ने न केवल दर्शकों का दिल जीता बल्कि यह भी साबित किया कि सार्थक कहानियों और सशक्त अभिनय के प्रति दर्शकों का आकर्षण आज भी उतना ही गहरा है।

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