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( बिद्युतपाल रचित अघोर कामनी पुस्तक का हुआ लोकार्पण )
पटना, 25 जनवरी. बांग्ला कवि और अंग्रेजी अखबार ‘बिहार हेराल्ड’ के संपादक बिद्युतपाल की नई पुस्तक ” अघोर कामिनी ” का लोकार्पण समारोह ऐतिहासिक विद्यालय ‘अघोर शिशु सदन’ में आयोजित किया गया. इस मौके पर बड़ी संख्या में पटना के साहित्यकार, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता सहित विभिन्न तबकों के लोग मौजूद थे. लोकार्पण समारोह का आयोजन बिहार बंगाली समिति, अघोर शिशु सदन और अभियान सांस्कृतिक मंच, पटना द्वारा आयोजित किया गया. पूरे कार्यक्रम का संचालन जयप्रकाश ने किया.
पटना विश्विविद्यालय में इतिहास की प्रोफ़ेसर रही भारती एस कुमार ने कहा ” ‘अधोर कामिनी’ जी को समझने के लिए यह बिद्युत्पाल की यह महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह एक वास्तविक कथा है। अघोर कामिनी का जीवन संघर्षों से भरा था और जीवन शिक्षा का अलख जगाने में समर्पित था। वे ब्रह्म समाज से जुडी थीं पर लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का पहला नाम है अघोर कामिनी देवी। इस प्रकार विद्युत पाल जी ने उन पर यह किताब लिखकर बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया है. “


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शिक्षाविद अनिल कुमार राय ने पुस्तक पर विचार प्रकट करते हुए कहा ” अघोर कामिनी पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री रहे विधान चंद्र राय की माँ थीं. उनका जन्म 1856 में हुआ था. वह वक्त 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम हो गया था. एक महिला जिसने महिलाओं पर काम किया और उस व्यक्तित्व को लगभग लोग नहीं जानते थे, विद्युत पाल जी ने उनका परिचय लोगों से कराकर बहुत बड़ा काम किया है। जो महत्व सावित्री बाई फुले का है वही स्थान बिहार में अघोर कामनी का है. अघोर कामिनी अनपढ़ थीं लेकिन उनके पति प्रकाशचंद्र ने उन्हें पढ़ाया और उसके बाद उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया. वह समय ही ऐसा था। परिस्थितियां ही कुछ ऐसी थी कि उसमें अघोर कामिनी देवी को आना ही था। उन्हें बनाने में नवजागरण की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। अधोर कामिनी देवी ने ब्रह्म समाज के उद्देश्यों खासकर सामाजिक उद्देश्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। “
वैशाली महिला कॉलेज में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अनिशा ने बताया ” मैं अघोर शिशु सदन के पास ही रही हूं. लेकिन कम जानती ठहरे इस स्कूल के ऐतिहासिक महत्व के बारे में. अघोर कामिनी अपने पति के प्रभाव में ब्रह्म समाज की सदस्य बनी. जातिप्रथा, स्त्री शिक्षा 1891 में 35 बर्ष की उम्र में ब्राह्मचर्य ग्रहण कर लिया अपने केश को काटकर साधिका बन गई सिर्फ अपनी बोली में नहीं बल्कि व्यवहार में भी. जब भी वह किसी परिचित के बारे में सूना करती थी की वह बीमाऱ है तो रात में भी उसके जाकर या खुद घर लाकर तीमारदारी करती थीं. अपनी पुत्री का विवाह अन्य जाति में किया जिसके कारण उन्हें काफी विरोध झेलना पड़ा. वे अपने समय से बहुत आगे थी. वे स्त्री शिक्षा, उनके प्रति अन्याय के खिलाफ लड़ने को लेकर तैयार रहा करती थीं. वे सिर्फ सावित्री बाई फुले ही नहीं बल्कि मदर टेरेसा भी थीं. वे पी. एम.सी.एच में जाकर रोगियों की सेवा किया करती थीं. बिद्युत्पाल ने इस गुमनाम महिला को सामने लाकर महत्वरपूर्ण काम किया. “

(बंगाली समिति, अघोर शिशु सदन और अभियान सांस्कृतिक मंच का संयुक्त आयोजन )
रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता मोना झा ” मैं बिद्युतपाल जी से लगभग 35 वर्षों से जुडी हैँ. अघोर कामिनी ने इतना बड़ा काम किया हमलोग कम जानते रहे हैँ. यह किताब लेकर बिद्युत्पाल जी ने बड़ा काम किया है. जब औरतों का वजूद घर संभालना और बच्चे पालना था. सावित्री बाई फुले का जन्म 1836 में, अघोर कामनी 1856 में तथा रुकैया शेखावत का 1880 में जन्म हुआ था. जब घर में सम्पन्न घरों की महिलाओं को विशेष स्थान दिया जाता था तब अघोर कामिनी ने विरोध किया. घोर कामिनी अपने अंदर की ताकत की बदौलत की थी. उन्होंने अपनी बेटी की शादी उसके स्कूल के शिक्षक से किया क्योंकि वह उनकी बेटी को पसंद था. उसके लिए उन्हें बहिष्कार झेलना पड़ा.”
जे. डी. वीमेंस कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर मधु बाला ने किताब पर विचार प्रकट करते हुए कहा ‘ एक रूढ़िवादी परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होने अपने लखनऊ जाकर बालिका विश्विद्यालय खोला. मोतिहारी में वे धान में नीला रंग डालकर धोती पहना करती थी. केंद्र में उनके पति प्रकाशचंद्र की पुस्तक ‘ अघोर प्रकाश ‘ को आधार बनाया है. उन दोनों के बीच कुछ चिट्ठियों का जिक्र किया है. पटना में रहते हुए जब उन्हें पता चलता कि कोई बीमाऱ है तो अपने अस्वस्थ पति को छोड़ कर अपने नौकर के साथ लालटेन लेकर चली जाया करती थीं. बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल का जीर्णोद्धार किया. इस किताब पर मैं अपने विभाग में परिचर्चा करूंगी. इस स्कूल और पीछे अघोर कामिनी के त्याग, बलिदान को याद करती हूं. मात्र 40 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई थी.”
अध्यक्षीय संबोधन देते हुए डॉ ( कैप्टन) दिलीप कुमार सिन्हा ने कहा ” मैं इस स्कूल के मैंनेजमेंट कमिटी से जुड़कर सौभाग्यशाली. विधानचंद्र राय इसी कमरे में बड़े हुए और पढ़े लिखे. इस स्कूल में मैट्रिक तक की पढ़ाई होती रही है लेकिन अभी मात्र आठ तक ही इजाज़त है. वी.सी.राय बताते हैँ कि पांच कमरे थे घर में उसमें एक कमरा बीमाऱ के लिए रखा जाता था. बी सी राय को भारत के इतने बड़े राजनेता बने उसमें इस स्कूल और घर का भी योगदान है. बांकीपुर स्कूल यहीं से निकलकर बनी और आज लड़कियों का सबसे अच्छा स्कूल बना. “

पुस्तक लेखक बिद्युतपाल ने पुस्तक की प्रक्रिया के बारे में बताया ” इस स्कूल में जुड़ने के पहले हम भी कुछ नहीं जानते थे. 2023 में मैं इस स्कूल से संबंधित हो पाया. इंटरनेट में मैंने ‘अघोर प्रकाश’ किताब खोजकर पढ़ा. लेकिन मेरे पास प्राइमरी सोर्स नहीं था. विधानचंद्र राय की जीवनी में भी बहुत कम था. अघोर कामिनी का परिस्थितियों से लड़ने के साथ-साथ एक अन्य पहलू प्लेटॉनिक लव की बाद ओर विचार किया ग्या था. दैहिक प्रेम को छोड़कर जनता के प्रति प्रतिबद्ध होकर ईश्वर से एकाकार होने की बात हुई थी. कुछ जो त्रुटियाँ रह गईं है क्योंकि हिंदी का लेखक नहीं हूं. रविंन्द्र नाथ राय ने जो संघर्ष किया उसे और आगे एक्सप्लोर करने की जरूरत है. कई बार हम अपनी माँ को भी नहीं जान पाते हैँ. “
सभा को इंजीनियरिंग कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर संतोष कुमार ने भी संबोधित किया धन्यवाद ज्ञापन स्कूल की प्राचार्य काकली साव ने किया.
समारोह में उपस्थित लोगों में प्रमुख थे डी. आई. जी सुशील कुमार एमिटी यूनिवर्सटी में विधि विभाग के डीन राजीव रंजन, गौतम गुलाल, कवि चन्द्रबिंद सिँह, शायर नीलांशु रंजन, युवा कवि राजेश कमल, पटना जिला किसान सभा के गोपाल शर्मा, इसकफ के अनंत शर्मा, रोहित शर्मा, शिक्षिका शिवांगी, जेवियर विश्विद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक तपेश्वर, चित्रकार मुकेश शर्मा, ए. आई. एस. एफ के आनंद कुमार, लेखक राजकुमार शाही, रौशन प्रकाश, कुंदन लोहानी आदि.
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