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पटना, 22 अप्रैल:
बिहार की सियासत और पुलिसिंग में बड़ा मोड़—राज्य में अब अपराधियों के खिलाफ एक नया, बेहद चर्चित और विवादित तरीका सुर्खियों में है, जिसे गलियारों में “लंगड़ा एनकाउंटर” कहा जा रहा है। दावा है कि इस रणनीति के तहत कुख्यात अपराधियों को भागने या फिर से अपराध करने से रोकने के लिए उनके पैरों पर निशाना साधा जा रहा है।
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सूत्रों के मुताबिक, हाल के हफ्तों में कई ऐसी मुठभेड़ें सामने आई हैं जिनमें संदिग्ध अपराधियों को पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किया गया। आधिकारिक तौर पर पुलिस इस शब्दावली से दूरी बना रही है, लेकिन “कड़ा एक्शन” लेने के संकेत साफ हैं।
इस नई रणनीति की तुलना सीधे Uttar Pradesh के चर्चित “बुलडोज़र एक्शन” से की जा रही है—वह मॉडल जिसे मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के कार्यकाल में अपराध के खिलाफ सख्त संदेश के तौर पर देखा गया। समर्थकों का कहना है कि “डर ही दवा है”, जबकि विरोधियों के मुताबिक यह कानून के दायरे से बाहर जाने का जोखिम है।

पटना के सड़कों से लेकर चाय-चौपाल तक बहस गरम है। एक तरफ लोग कह रहे हैं—“अपराधियों को अब समझ आएगा,” तो दूसरी तरफ आवाज़ उठ रही है—“क्या कानून अब अदालत में नहीं, सड़क पर तय होगा?”मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस ट्रेंड पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि अगर “एनकाउंटर संस्कृति” को बढ़ावा मिला, तो यह न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है। “कानून का राज, गोली का नहीं,” एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने चेतावनी दी।
वहीं पुलिस सूत्रों का कहना है कि कार्रवाई पूरी तरह कानूनी दायरे में हो रही है और आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल वही—क्या यह महज़ संयोग है कि ज़्यादातर गोलियां ‘नीचे’ लग रही हैं?
राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज है। विपक्ष इस पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि सत्तापक्ष इसे “अपराध के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस” का संकेत बता रहा है।
बिहार में यह नया ‘सख्त अंदाज़’ अपराध कम करेगा या नई बहस छेड़ेगा—फिलहाल पूरा राज्य इसी सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रहा है।
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