पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ इस विषय पर समाज मे व्याप्त भ्रांतियों से धूल हटाने का एक शोधपरक प्रयास है: मिथिलेश के सिंह


शैलेश कुमार सिंह
पटना,बिहार में गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के सहायक कुल सचिव तथा इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े विषयों के मशहूर लेखक मिथिलेश के सिंह ने कहा कि प्राचीन, मध्य,औपनिवेशिक तथा समकालीन लेखन में शूद्रों के बारे में अनेक भ्रांतियां मौजूद हैं और उनकी नव प्रकाशित पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ इस विषय पर ऐतिहासिक तथ्यों को तार्किक रूप से सामने लाने का एक शोधपरक प्रयास है।

‘अंबेडकर, इस्लाम और वामपंथ’ जैसी पुस्तक लिख कर पहले ही स्वनामधन्य हो चुके श्री सिंह ने कहा कि पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ करीब चार वर्षों के शोध एवं अध्ययन का प्रतिफल है। उन्होंने कहा कि यह विषय समय समय पर हिंदुस्तानी और विदेशी लेखकों को आकर्षित करता रहा है, लेकिन परस्पर विरोधी विचारधारा की वजह से शोधार्थियों के कौतूहल में कमी नही आई है।
लेखक ने कहा कि उनके अंदर भी इस विषय को लेकर कौतूहल भरा हुआ था , इसलिये उन्होंने इस विषय पर तथ्यों को परखा, लिखा और अंतिम निर्णय का अधिकार पाठकों के हवाले कर दिया है। उदाहरण के तौर पर यूरोपियन विद्वानों का एक स्कूल कहता है कि भारत में शूद्रों को पढ़ने लिखने या अध्ययन करने का अधिकार नहीं था। इस भ्रांति के सामने उन्होंने अगस्त्य, वाल्मीकि, वेदव्यास और सूत जी जैसे कई प्राचीन भारत के महान शुद्र रचनाकारों का उदाहरण रखा और निर्णय का अधिकार पाठकों पर छोड़ दिया। उसी तरह से जिन लोगों को लगता है कि शुद्र जन्म से दलित, शोषित या वंचित थे, उन्हें यह पुस्तक याद दिलाती है कि भारतीय इतिहास के प्रथम चक्रवर्ती राजा सुदास शुद्र थे। उन्होंने ऋग्वेद के कई श्लोकों की रचना भी की थी।

पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ में तथ्यों के आधार पर बताया गया है कि प्राचीन काल मे ब्राम्हणों और क्षत्रियों का विवाह वैश्य तथा शूद्रों से होता था और इसके कई उदाहरण भी पुस्तक में दिए गए हैं। यह बताया गया है कि व्यास की मां मछुआइन, वशिष्ठ की गणिका और मुनिश्रेष्ठ मदनपाल की मां मल्लाहिन थी। पुस्तक उंस भ्रांति को भी तोड़ती है, जिसमे बहुत से लेखक कहते हैं कि सारे शुद्र अनार्य थे और आर्यों ने उनको दास बना लिया था।

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पुस्तक में लेखक यह बताने का प्रयास करते हैं कि समाज भले वर्ग, वर्ण और जाति के फंदे में फंसता गया, लेकिन भारत में लम्बे समय तक सामाजिक समरसता अबाध गति से आगे बढ़ रही थी। सभी वर्ग और वर्ण अपने निर्धारित कार्यों में जुटे थे और जिस हीन भावना को शूद्रों के अस्तिव से जोड़ने का प्रयास किया गया उसका भारतीय समाज में नामोनिशान नही था। यह पुस्तक बेंजामिन टुडेलो, अब्दुर्रज्जाक, फाह्यान अलबरूनी और मार्कोपोलो जैसे लेखकों को कोट कर बताती है कि तब का भारतीय समाज समतामूलक था।

अब सवाल उठता है कि शूद्रों को लेकर इस तरह की हीनता और भ्रांति कहां से उपजी। इस सवाल के जवाब में लेखक औपनिवेशिक काल के तथ्यों को सामने लाते हैं। यह बताते हैं कि किस तरह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय भारतीय समाज की एकता ने अंग्रेजों की नींद में खलल डाल दिया था। ‘अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो’ की नीति ने भारतीय समाज को असंख्य टुकड़ों में बांट दिया। ऐसी हालत में सामाजिक स्वरूप को बदनाम किया गया। ऐसे वर्ग और जातियों को तैयार किया गया जो पहले से मौजूद नही थे। पुस्तक इशारा करती है कि 1901 में भारत मे बैठी हुई ब्रिटिश हुकूमत ने 2314 जातियों की सूची बनाई थी, लेकिन 1931 में जारी सूची में इसकी संख्या 4114 हो गयी थी, जो एक गहरे षडयंत्र का परिणाम थी।

श्री सिंह ने बताया कि शूद्रों से सम्बंधित समाज के नजरिये में बदलाव लाने में मैक्समूलर, ग्लैडविन, चार्ल्स विल्किंस और जोनाथन डंकन जैसे यूरोपियन लेखकों की भूमिका पर भी यह पुस्तक प्रकाश डालती है।
पुस्तक वामपंथी विचारधारा और शूद्रों को लेकर उनके राजनीतिक प्रयोग को भी सामने लाती है और यह सोचने पर विवश करती है कि जिस दलित, शोषित और वंचित समाज को वामपंथियों ने शुद्र समाज से जोड़ दिया, क्या वह सही व्याख्या है?
इस पुस्तक ने बाबा साहेब अंबेडकर और मनुस्मृति पर उनके विचारों से जुड़ी भ्रांतियों की भी पड़ताल की है। पुस्तक बताती है कि विद्वानों जिनमे सर विलियम जोंस से महात्मा गांधी तक कई नाम हैं, ने माना कि मनुस्मृति के मूल संस्करण में इतने श्लोक नही थे, जितने बाद में दिखाए गए। उनका मानना है कि बहुतायत श्लोक बाद में जोड़ दिए गए, जिससे इसकी बदनामी हुई। गांधी ने अपनी पुस्तक वर्ण व्यवस्था में माना कि मनुस्मृति में पाई जाने वाली अधिकांश आपत्तिजनक बातें बाद में मिलावट से आईं। पुस्तक बताती है कि मनुस्मृति से सम्बंधित अंबेडकर के विचार अंग्रेजी में अनुदित पुस्तकों के पाठन से आये, जिसमे वैसे श्लोक भी शामिल थे, जो क्षेपक थे। लेखक का मानना है कि इन क्षेपक श्लोकों का अस्तित्व नही होता तो शायद अंबेडकर के विचार मनुस्मृति के लिए थोड़े अलग होते।
लेखक श्री सिंहं ने कहा कि अंबेडकर ने अपने निष्कर्ष में साफ किया है कि शुद्र आर्य थे। उन्होंने उनके अनार्य रूप में पराजित योद्धा वाली थ्योरी को नकार दिया था।
इस पुस्तक में जातियों के उद्भव पर एक विस्तृत चैप्टर है। पुस्तक इस बात पर प्रकाश डालती है कि प्राचीन समय मे वर्ण का आधार कर्म था और कर्म बदलने से वर्ण भी बदल जाता था। ऐसे भी उदारण उपलब्ध हैं जिसमे एक ही परिवार में कर्म के हिसाब से दो वर्ण के लोगों का उल्लेख है। ऋष्टिसेण के पुत्रों देवापि एवं शांतनु में एक ब्राम्हण तो दूसरा क्षत्रिय था। पुस्तक तार्किक रूप से बताती है कि जातियों का उद्भव और विकास धीरे धीरे हुआ और शुरू में इसके फायदे बहुत थे। दरअसल जाति में जातिवाद, छुआछूत तथा अस्पृश्यता के प्रभाव ने इसे विभिन्न दोषों के हवाले कर दिया।

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उल्लेखनीय है कि एक पाठक के रूप में मुझे लेखक मिथिलेश के सिंह की यह पुस्तक शोध एवं तथ्यों से भरी हुई मिली। इस पुस्तक में वर्ण, वर्ग और जाति के साथ आर्य बनाम द्रविड़, यूरोपीय, इस्लामी और हिंदुस्तानी दास प्रथा की विभिन्नताओं जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। नेहरू सरीखे गंभीर इतिहास की समझ रखने वालों के साथ रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ जैसे कवियों की रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय में लिखी बातों की भी चर्चा की गई है। इसमें सैकड़ों यूरोपियन, इस्लामी और भारतीय लेखकों की पुस्तकों के कोट के साथ तार्किकता की कसौटी के दर्शन होते हैं। मेरा ख्याल है कि जिन पाठकों की रुचि भारत के सामाजिक परिवेश को समझने और सांस्कृतिक विरासत को जानने में है, उनके सामने इस पुस्तक के अध्ययन का विकल्प उपलब्ध है।

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